Tuesday, September 18, 2012

"गणेश जी की संपूर्ण आरधना विधि एवं मंत्र"


      ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्‌ भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्‌॥
ओंकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ओंकाराय नमो नमः॥
     
ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्‌। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः श्रृण्वन्नूतिभिः सीदसादनम्‌॥
     वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
       गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजंबूफलसारभक्षितम्‌। उमासुतं शोकविनाशकारणं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्‌॥
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः। धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि। विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्‌। भक्‍तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थसिद्धये॥
अगजाननपद्मार्कं गजाननमहर्निशम्‌। अनेकदन्तं भक्तानां एकदन्तमुपास्महे॥
गजवक्त्रं सुरश्रेष्ठं कर्णचामरभूषितम्‌। पाशांकुशधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम्‌॥
एकदंतं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम्‌। लंबोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम्‌॥
गजवदनमचिन्त्यं तीक्ष्णदंष्ट्रं त्रिनेत्रं बृहदुदरमशेषं भूतिराजं पुराणम्‌। अमरवर-सुपूज्यं रक्तवर्णं सुरेशं पशुपतिसुतमीशं विघ्नराजं नमामि॥
कार्यं मे सिद्धिमायातु प्रसन्ने त्वयि धातरि। विघ्नानि नाशमायान्तु सर्वाणि
 सुरनायक॥
मूषिकवाहन् मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र। वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते॥
एकदंताय विद्महे। वक्रतुंडाय धीमहि। तन्नो दंती प्रचोदयात्‌॥ 


॥ गणपति होमम् विधि॥
ॐ सर्वेभ्यो गुरुभ्यो नमः॥। ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः॥। ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः॥ प्रारंभ कार्यं निर्विघ्नमस्तु। शुभं शोभनमस्तु। इष्ट देवता कुलदेवता सुप्रसन्ना वरदा भवतु॥ अनुज्ञां देहि॥
ॐ केशवाय स्वाहा।। ॐ नारायणाय स्वाहा।। ॐ माधवाय स्वाहा।।

 ॐ गोविंदाय नमः॥। ॐ विष्णवे नमः॥। ॐ मधुसूदनाय नमः॥। ॐ त्रिविक्रमाय नमः॥। ॐ वामनाय नमः॥। ॐ श्रीधराय नमः॥।
ॐ हृषीकेशाय नमः॥। ॐ पद्मनाभाय नमः॥। ॐ दामोदराय नमः॥। ॐ संकर्षणाय नमः॥। ॐ वासुदेवाय नमः॥। ॐ प्रद्युम्नाय नमः॥।
ॐ अनिरुद्धाय नमः॥। ॐ पुरुषोत्तमाय नमः॥। ॐ अधोक्षजाय नमः॥। ॐ नारसिंहाय नमः॥। ॐ अच्युताय नमः॥। ॐ जनार्दनाय नमः॥।
ॐ उपेंद्राय नमः॥। ॐ हरये नमः॥। श्री कृष्णाय नमः॥
प्राणायामः
ॐ प्रणवस्य परब्रह्म ऋषिः। परमात्मा देवता। दैवी गायत्री छन्दः। प्राणायामे विनियोगः॥

ॐ भूः। ॐ भुवः। ॐ स्वः। ॐ महः। ॐ जनः। ॐ तपः। ॐ सत्यं। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्॥

ॐ आपोज्योति रसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवस्सुवरोम्॥
ॐ श्रीमान् महागणाधिपतये नमः॥
४ संकल्पः

ॐ श्रीमान् महा गणाधिपतये नमः॥। श्री गुरुभ्यो नमः॥। श्री सरस्वत्यै नमः॥। श्री वेदाय नमः॥। श्री वेदपुरुषाय नमः॥। इष्टदेवताभ्यो नमः॥।
कुलदेवताभ्यो नमः॥। स्थान देवताभ्यो नमः॥। ग्राम देवताभ्यो नमः॥। वास्तु देवताभ्यो नमः॥। शचीपुरंदराभ्यां नमः॥। उमामहेश्वराभ्यां नमः॥।
मातापितृभ्यां नमः॥। लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः॥। सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमो नमः॥। सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमो नमः॥।
येतद्कर्मप्रधान देवताभ्यो नमो नमः॥
॥ अविघ्नमस्तु॥

शुक्लांबरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्व विघ्नोपशांतये॥
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्रयंबके देवी नारायणी नमोऽस्तुते॥

सर्वदा सर्व कार्येषु नास्ति तेषां अमंगलं। येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनो हरिः॥
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चंद्रबलं तदेव। विद्या बलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपतेः तेंघ्रिऽयुगं स्मरामि॥

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः। येषां इन्दीवर श्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥
विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्माविष्णुमहेश्वरान्। सरस्वतीं प्रणम्यादौ सर्व कार्यार्थ सिद्धये॥

श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञाय प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽद्वितीय परार्धे विष्णुपदे श्री श्वेतवराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे भारत वर्षे भरत खंडे जंबूद्वीपे दण्डकारण्य देशे गोदावर्या दक्षिणे तीरे कृष्णवेण्यो उत्तरे तीरे परशुराम क्षेत्रे (AMERICA......)शालिवाहन शके वर्तमाने व्यवहारिके विकरम  नाम संवत्सरे उत्तरायणेदक्षिणायणे अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुक नक्षत्रे अमुक वासरे सर्व ग्रहेषु यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु येवं गुणविशेषेण विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अस्माकं सकुढुम्बानां मम कार्यक वाचिक मानसिक ज्ञात अज्ञात समस्त पापक्षयद्वारा चिन्त शुद्ध्यर्थं करिष्यमाण सकल कार्येषु
निर्विघ्नता पूर्वक सर्वाभिष्ठसिद्ध्यर्थं काम्ना विशेषेतु अमुक काम्ना  Replace with whichever  कन्याः विवाह कार्य  or  वर अन्वेषणे सिद्धयर्थं  or  विध्याभ्यास सफलार्थे or  परदेश गमन सिद्ध्यर्थे  or  मोक्ष सिद्ध्यर्थे श्री महागणपतिं प्रीत्यर्थं श्री महागणपति होमं करिष्ये। तदा आदौ शान्त्यर्थं पुण्याः वाचनं निर्विघ्नता सिद्ध्यर्थं गणपथि पूजनं करिष्ये॥
इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरतस्तव। तेनमे सफलावाप्तिर् भवेत् जन्मनि जन्मनि॥
५ आवाहनं
मोदके विघ्नेशं आवाहयामि 

  1. प्रतुके उर्विं आवाहयामि
  2. लाजेषु दिनेशं आवाहयामि 
  3. सत।ह्त्कुनि अग्निं आवाहयामि 
  4. इक्षौ सोमं आवाहयामि 
  5. नालिकेरे ईशानां आवाहयामि 
  6. तिले हरिं आवाहयामि 
  7. कदलिफले ब्रह्मणां आवाहयामि 
ध्यायामि। ध्यानं समर्पयामि॥ आवाहनं समर्पयामि। आसनं समर्पयामि॥पाद्यं समर्पयामि। अर्घ्यं समर्पयामि॥ आचमनीयं समर्पयामि। स्नानं समर्पयामि॥
वस्त्रं समर्पयामि। यज्ञोपवीतं समर्पयामि॥ गंधं समर्पयामि। धूपं आघ्रापयामि॥दीपं दर्शयामि। नैवेद्यं निवेदयामि॥ मन्त्रपुष्पं समर्पयामि। सकल पूजार्थे अक्षतान् समर्पयामि॥
मुद्रा
  • निर्वीषि करणार्थे तार्क्ष मुद्रा  
  • पवित्री करणार्थे शंख मुद्रा 
  • विपुलमाया करणार्थे मेरु मुद्रा

६ अग्नि पिठ पूजा
बलम वर्धना नमनम्  अग्निम प्रतिस्थापयेतम् ॥

१. ॐ आदार शक्त्यै नमः॥
२. ॐ मूल प्रकृत्यै नमः॥
३. ॐ कूर्माय नमः॥
४. ॐ अनन्ताय नमः॥
५. ॐ पृथिव्यै नमः॥
६. ॐ इक्षु सागराय नमः॥
७. ॐ रत्न दीपाय नमः॥
८. ॐ कल्प वृक्षाय नमः॥
९. ॐ मणि मण्डपाय नमः॥
०. ॐ रत्न सिंहासनाय नमः॥
११. ॐ श्वेत छत्राय नमः॥
१२. ॐ धर्माय नमः॥
१३. ॐ ज्ञानाय नमः॥
१४. ॐ वैराग्याय नमः॥
१५. ॐ ऐश्वर्याय नमः॥
१६. ॐ अधर्माय नमः॥
१७. ॐ अज्ञानाय नमः॥
१८. ॐ अवैराग्याय नमः॥
१९. ॐ अनैश्वर्याय नमः॥
२०. ॐ सर्व तत्व पद्माय नमः॥
२१. ॐ आनन्द कन्दाय नमः॥
२२. ॐ सांविन्नलाय नमः॥
२३. ॐ प्रकृतिमय दलेभ्यो नमः॥
२४. ॐ विकारमय केसरेभ्यो नमः॥
२५. ॐ पञ्चाशद्वर्ण कर्णिकायै नमः॥
२६. ॐ पृथिव्यात्मने परिवेशाय नमः॥
२७. अं अर्क मण्डलाय अर्थप्रद द्वादश कलात्मने नमः॥
२८. उं सोम मण्डलाय कामप्रद षोडष कलात्मने नमः॥
२९. रं वह्नि मण्डलाय धर्मप्रद दश कलात्मने नमः॥
३०. सं सत्वाय नमः॥
३१. रं रजसे नमः॥
३२. तं तमसे नमः॥
३३. मं मायायै नमः॥
३४. विं विध्यायै नमः॥
३५. आं आत्मने नमः॥
३६. अं अन्तरात्मने नमः॥
३७. पं परमात्मने नमः॥
३८. सं सर्वतत्वात्मने नमः॥
३९. ॐ तीव्रायै नमः॥
४०. ॐ ज्वालिन्यै नमः॥
४१. ॐ नन्दायै नमः॥
४२. ॐ भोगदायै नमः॥
४३. ॐ कामरूपिण्यै नमः॥
४४. ॐ उग्रायै नमः॥
४५. ॐ तेजोवत्यै नमः॥
४६. ॐ सत्यायै नमः॥
४७. ॐ विघ्न नाशिन्यै नमः॥
४८. ॐ श्रीं ह्रीं क।ह्लीं ग।ह्लौं गं नमो भगवते सर्व भूतात्मने  सर्व शक्तिर् कमलासनाय नमः॥

७ प्राण प्रथिष्ठा
ॐ एकदन्ताय नमः॥ (pour water thrice)
गणक ऋषिः गायत्रि छन्दः  श्री महागणपतिं देवता
महागणपति प्रीत्यर्थ होमे विनियोगः

॥ ंअहा गणपति न्यास॥

ॐ गणानां त्वा इति मंत्रस्य घृत्समद ऋषिः। गणपतिर्देवता। जगति छंदः॥ महा गणपति न्यासे विनियोगः॥
गणानांत्वेति अंगुष्ठाभ्यां नमः॥ गणपतिं हवामहे इति तर्जनीभ्यां नमः॥ कविं कवीनां इति मध्यमाभ्यां नमः॥उपवश।ह्त्रम इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः॥
आन शृण्वन्नूतिभिः सीदसादनमिति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः॥

॥ एवं हृदयादि न्यासः॥
ॐ भूर्भुवस्सुवरोम्। इति दिग्बन्धः॥

गणानांत्वायै शिरसे स्वाहा। ॥गणपतिमिति ललाटाय नमः॥हवामहे इति मुखाय नमः॥कविं कवीनामिति हृदयाय नमः॥उपमश्रवस्तमम् इति नाभ्यै नमः॥
ज्येष्ठराज्य इति कट।ह्यै नमः॥ब्रह्मणां इति ऊरुभ्यां नमः॥ब्रह्मणस्पत इति जानुभ्यां नमः॥आ नः शृण्वन् इति जठराभ्यां नमः॥नूतिभिः इति गुल।ह्फौभ्यां नमः॥सीदसादनम् इति पादाभ्यां नमः॥

८ दिग्बन्धन

ॐ भूर्भुवस्सुवरोम्। इति दिग्बन्धः।(Snap fingers circle head clockwise and clap hands)

दिशो बद्नामि॥

९ ध्यानं

ॐ  ॐ  श्री गणेशाय नमः॥श्री गणेशाय नमः॥श्री गणेशाय नमः॥

विनायकं हेमवर्षं पाशांकुशधरं विभुं। दययोर् गजाननं देवं भालचंद्र समप्रभं॥

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम्॥

श्री विनायकाय नमः॥।  ध्यानात् ध्यानं समर्पयामि॥

१० आवाहनं

स्वात्म संस्थं अजं शुद्धं अध्य गणनायक। हरण्यां इव हव्याश्म अग्न्यावा आवाहयाम्यहं॥ ॐ ह।ह्रिं भूर्भुवस्सुवरोम्॥आवाहितो भव। स्थापितो भव। सन्निहितो भव। सन्निरुद्धो भव। अवकुण्ठितो भव। सुप्रीतो भव। सुप्रसन्नो भव। सुमुखो भव। वरदो भव।प्रसीद प्रसीद॥
११ आहुति

१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२. ॐ औम् स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४. ॐ श्रीं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६. ॐ ह्रीं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
८. ॐ क।ह्लीं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१०. ॐ ग।ह्लौं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
११. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१२. ॐ गं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१४. ॐ णं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१६. ॐ पं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१८. ॐ तं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२०. ॐ यें स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२२. ॐ वं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२४. ॐ रं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२६. ॐ वं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२८. ॐ रं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
२९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३०. ॐ सं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३२. ॐ र्वं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३४. ॐ जं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३६. ॐ नं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३८. ॐ में स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
३९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४०. ॐ वं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४२. ॐ शं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४४. ॐ मां स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४६. ॐ नं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४८. ॐ यं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
४९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५०. ॐ स्वां स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५२. ॐ हां स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५४. ॐ ॐ स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५६. ॐ ह्रीं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५८. ॐ क।ह्लीं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
५९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६०. ॐ ग।ह्लौं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६२. ॐ गं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६४. ॐ गणपतये स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६६. ॐ वरं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६८. ॐ वरद स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
६९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७०. ॐ सर्वजनं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७२. ॐ में स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७४. ॐ वशं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७६. ॐ आनयं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७८. ॐ स्वाहा।  स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
७९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
८०. ॐ श्रीं रमा रमेशाभ्यां स्वाहा।
     रमा रमेशौ तर्पयामि॥
८१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
८२. ॐ ह्रीं गिरिजा वृषांकाभ्यां स्वाहा।
     गिरिजा वृषांकौ तर्पयामि॥
८३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
८४. ॐ क।ह्लीं रतिमदनाभ्यां स्वाहा।
     रति मदनौ तर्पयामि॥
८५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
८६. ॐ ग।ह्लौं मही वराहाभ्यां स्वाहा।
     मही वराहौ तर्पयामि॥
८७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
८८. ॐ गं लक्ष्मी गोपनायकाभ्यां स्वाहा।
     लक्ष्मी गोपनायकौ तर्पयामि॥
८९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
९०. ॐ गं सिद्ध्या मोदाभ्यां स्वाहा।
     सिद्ध्यामोदौ तर्पयामि॥
९१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
९२. ॐ गं समृद्धि प्रमोदाब्यां स्वाहा।
     समृद्धि प्रमोदौ तर्पयामि॥
९३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
९४. ॐ गं कान्ति सुमुखाभ्यां स्वाहा।
     कान्ति सुमुखौ तर्पयामि॥
९५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
९६. ॐ गं मदनावति दुर्मुखाभ्यां स्वाहा।
     मदनावति दुर्मुखौ तर्पयामि॥
९७. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
९८. ॐ गं मदद्रवा विघ्नाब्यां स्वाहा।
     मदद्रवा विघ्नौ तर्पयामि॥
९९. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१००. ॐ गं द्राविणी विघ्न कर।ह्त्रुब्यां स्वाहा।
      द्राविणी विघ्न कर्तौ तर्पयामि॥
१०१. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१०२. ॐ गं वसुधारा शङ्खनिधिब्यां स्वाहा।
      वसुधारा शङ्खनिधिं तर्पयामि॥
१०३. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१०४. ॐ गं वसुमति पुष्पनिधिभ्यां स्वाहा।
      वसुमति पुष्पनिधिं तर्पयामि॥
१०५. ॐ मूलं स्वाहा।  श्री महागणपतिं तर्पयामि॥
१०६. ॐ कर्मेश्वरार्पणं स्वाहा।
१०७. ॐ ॐ स्वाहा।
१०८. ॐ ॐ श्रीं स्वाहा।
१०९. ॐ ॐ श्रीं ह्रीं स्वाहा।
११०. ॐ ॐ श्रीं ह्रीं क।ह्लीं स्वाहा।
१११. ॐ ॐ श्रीं ह्रीं क।ह्लीं ग।ह्लौं स्वाहा।
११२. ॐ ॐ श्रीं ह्रीं क।ह्लीं ग।ह्लौं गं गणपतये
      स्वाहा।
११३. ॐ ॐ श्रीं ह्रीं क।ह्लीं ग।ह्लौं गं गणपतये
      वरवरद स्वाहा।
११४. ॐ ॐ श्रीं ह्रीं क।ह्लीं ग।ह्लौं गं गणपतये
      वरवरद सर्वजनं मे स्वाहा।
११५. ॐ ॐ श्रीं ह्रीं क।ह्लीं ग।ह्लौं गं गणपतये
      वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
११६. ॐ ॐ श्रीं ह्रीं क।ह्लीं ग।ह्लौं गं गणपतये  वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।   स्वाहा॥
ॐ इतः पूर्व प्राण बुद्धि देह धर्मार्धिकारतो जागरत् स्वप्न सुशुप्त्य अवस्तासु मनसा वाचा कर्मणा हस्ताब्यां पद्भ्यां उदरेन शीर्ष्णा यद।ह्कृतं यदुक्तं यत्स्मृतं तत् सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु स्वाहा।  स्वाहा। ॥

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर् ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥

ॐ लम्बोदराय नमः॥।  तृप्तिरस्तु॥

Monday, September 17, 2012

भारत और चीन एक नजर में

दुनिया में सबसे ज्यादा भारत को ही लूटा ज़ा रहा है, भारत और चीन की तुलना करके देखिये की चीन तेजी से ऊपर क्यों ज़ा रहा है .....विदेशी कम्पनियां चीन को नहीं लूट पाती है क्योकि.....

१-भारत में इस समय अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार सत्ता में है,

 जब की चीन में भ्रष्ट लोगो के लिए मौत की सजा का कानून है और अभी अगस्त में २ बड़े अधिकारियो को फांसी दे दी गयी है.

२-भारत की सरकार कालाधन जमा करने वालो को बचाती है, जब की चीन की सरकार ने अभी अभी स्वामी रामदेवजी के 4जून के अनशन से प्रभावित होकर विदेश में खाता रखने वालो के लिए फांसी की सजा का प्राविधान किया है.

३-भारत में एक प्रभावी लोकपाल के लिए जनता को सड़क पर उतरना पड़ रहा है, वही चीन में भ्रष्टो के लिए फांसी का कानून रामबाण सिद्ध हो गया है, अब तो कालाधन रखने वाले भी इसी श्रेणी में आ गए है जो की स्वामी रामदेवजी के कारन हुआ.

४-भारत में हर मंत्रालय सिर्फ आयात पर जोर देता है जिससे की कालाधन बनाया ज़ा सके, चीन की सरकार सिर्फ निर्यात पर जोर देकर अकूत विदेशी मुद्रा कमा रही है.आयात को कम करते ज़ा रहे है.

५-भारत में विदेशी कंपनी आती है तो सिर्फ ऑफिस खोलकर बाहर से सामान आयात करके भारत को बाजार बनाते है, निर्यात नहीं करते है जिससे भारत का ही पैसा बाहर ज़ा रहा है, जब की चीन में विदेशी कंपनी आती है, कारखाना लगाती है, चीनियों को रोजगार देती है,चीन का कच्चा माल प्रयोग करती है, सारा सामान चीन से बाहर निर्यात करके अकूत विदेशी मुद्रा चीन को मिलती है.

६-भारत में देशी कंपनियों को प्रताड़ित किया जाता है और उन्हें टैक्स और कानून के शिकंजे में फंसाकर विदेशी कंपनियों को खुश किया जाता है, जब की चीन में सरकार खुद देशी कंपनियों को बताती है किस प्रकार उत्पादन बढ़ाये और निर्यात बढ़ाये, इसके लिए उन्हें विदेशी कानूनों से भी बचाया जाता है. देशी कंपनियों को दुनिया भर की रियायत दी जाती है.

७-भारत में एक ही काम के लिए बीस टैक्स और बीस कानून हैं, चीन में कानून पारदर्शी और अपरिहार्य कानून और टैक्स है जो निर्यात में मदद करते है.

८-भारत में लालफीता शाही घुसखोरी का मुख्य कारण है, चीन में घुस खोरी की सजा फांसी है. हर मर्ज की एक दवा है. सही काम तुरंत होता है, सरकार बाधा के सख्त खिलाफ है.

९-भारत सरकार के ऊपर ३४ लाख करोड़ रुपये का कर्जा है, जब की चीन सरकार अकेले अमेरिका को ही ७५० करोड़ डालर का कर्जा दे रखा है, बाकि का कोई हिसाब नहीं है,

१०-भारत का ४०० लाख करोड़ रूपये का कालाधन ७० विदेशी बैंको में जमा है जो भारत के किसी काम नहीं आ रहा है, जबकि चीन की सरकार ने अन्दर ही अन्दर अपना कालाधन वापस ले लिया है और प्रक्रिया जोर से चालू है. अब तो कालाधन के खातेदरों केलिए भी फांसी की सजा निर्धारित कर दिया है.

११-भारत में गोपनीयता के नाम पर सेना में भारी लूट मची है और सेना की ताकत प्रभावित हो रही है, जब की चीन में फांसी की सजा का प्राविधान होने के कारन सेना भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त है.

१२-भारत में अंग्रजी दवा बनाने वाली विदेशी कंपनियों की लूट मची है, चीन में आदि काल से ही आयुर्वेदिक औषधियों को प्राथमिकता दी जाती है.विश्व में सबसे ज्यादा देशी दवाये चीन में प्रयोग की जाती है, भारत दुसरे नंबर पर है जब की चीन में करीब १३५ करोड़ लोग है, भारत में १२१ करोड़. भारत के सबसे ज्ञानवान आयुर्वेदिक पंडित आचार्य बालकृष्ण जी को फर्जी जांच में उलझाया जाता है क्योकि वह रामदेव जी के सहयोगी है.

१३-भारत में सरकार के पास भ्रष्टाचार रोकने की इक्षाशक्ति नहीं है, जब की चीन में हर मर्ज की एक दवा है-"भ्रष्टो को मौत"

१४-भारत में ४५% लोग अशिक्षित है और १% लोग अंगेजी जानते है, चीन में १००%शिक्षा चीनी भाषा में दी जाती है और उनके कम्पुटर भी अंग्रेजी में नहीं, चीनी भाषा में होते है.

१५-भारत में विदेशी घुसपैठिये को वोटर कार्ड दिया जाता है, चीन में विदेशियों को इतनी ताड़ना दी जाती है की कोई वहा गलत तरीके से जाता ही नहीं और गया तो छुप नहीं पाता है, चीन के लिए खतरा बने लोग ऊपर भेज दिए जाते है, भारत में मुक़दमा किया जाता है और बिरयानी खिलाई जाती है.

१६-भारत अपनी जमीन छोड़ देता है और पीछे हटने को बोल दिया जाता है, जबकि चीन औसत हर साल करीब एक जिले के बराबर जमीन कही न कही कब्ज़ा करता है.

१७-भारत में सरकार ने ऐसे व्यवस्था बना दिया है की बच्चों के पालन में ही पूरी उर्जा समाप्त हो जाती है और पूरा परिवार त्रस्त रहता है, जब की चीन सरकार आम जनता को दुनिया भर की रियायत देती है, शिक्षा और सुरक्षा सरकार फ्री में करती है और निर्यातक नीति की वजह से सबको काम दिया जाता है, माता पिता को सिर्फ एक संतान पैदा करने की अनुमति है.

१८-भारत में वोट की राजनीति होती जिसकी वजह से लोकतंत्र को लूटतंत्र में बदल दिया गया है, चीन में सिर्फ यही एक चीज नहीं है इसलिए हमें विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव मिला हुआ है. भारत में हर कदम वोट को ध्यान में रखकर उठाया जाता है.

"इन्ही सब कारणों से भ्रष्टो को जीने का हक़ नहीं है, उन्हें फांसी होनी ही चाहिए"
 


Sunday, September 16, 2012

अफ़सोस तो यही हैं



---- परन्तु अफ़सोस तो यही हैं हैं हमें की अब अपनी सांस्कृतिक धरिहार से ज्यादा बेढंगी पाश्चात्य शैली पर विशवास हैं, 


भारतीय संस्कृति का सबसे प्राचीन आधार ग्रन्थ वेद है। वेद ही सब सभ्यताओं की जननी और व्यवस्थाओं का स्रोत है। आर्य धर्म के तो प्राण ही वेद हैं। ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’ अर्थात् वेद ही सब धर्मों के मूल हैं; ऐसा सर्व सम्मत सिद्धान्त है। इसी आधार पर हम यह भी विवेचनापूर्वक खोज करना चाहते हैं कि भारत को विध्वंस करने वाली इस वर्ण व्यवस्था का भी कहीं वेदों में पता है या नहीं। यदि निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाय तो यह वर्ण व्यवस्था ही हिन्दुओं के लिए मरण-व्यवस्था बन रही है। कोई इसको जातपाँत का रोग कह देता है और कोई इसको बिरादरिओं की बीमारी पुकारता है। वास्तव में इसका सारा श्रेय इस वर्त्तमान वर्ण व्यवस्था को ही है। हाँ! आर्य-समाजियों ने गुण-कर्म-स्वभाव का एक नया आडम्बर खड़ा करके इस वर्ण व्यवस्था के गिरते किले को दृढ़ करने का विफल प्रयास अवश्य किया है। परन्तु कालचक्र के प्रभाव से तथा आर्य समाजियों की पोप प्रियता से गुण-कर्म-स्वभाव का जामा अब विशीर्ण प्राय हो गया है। अब आर्य समाजियों की भी वर्ण व्यवस्था उसी घोरतम रूप में उपस्थित हो चुकी है-जिसके लिए हिन्दुओं को खूब कोसा जाता था। ऐसी दशा में वर्ण व्यवस्था का बावेला मचाने वालों को समझ लेना चाहिए कि भारतवर्ष में प्रचलित वर्ण व्यवस्था (जातपाँत) का हम भण्डाफोड़ करना चाहते हैं। यही प्रचलित वर्ण व्यवस्था भारतीयों के लिए एक हौआ बनी हुई है। महात्मा गाँधी ने भी लिखा है कि-The present caste system is the very antithesis of Varnashrama। सबसे बड़ी त्रुटि तो यह है कि इस प्रचलित वर्ण व्यवस्था का मूल स्वार्थी लोग वेदों में भी बताते हैं और शास्त्रों की दुहाई देकर तमाम हिन्दू जनता के मुख पर ताला लगाना चाहते हैं कि कोई भी इस वर्त्तमान विद्यातिनी वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध एक शब्द भी न बोल सके। ऐसे सभी स्वार्थी पण्डितम्मन्यों का मुखमर्दन करने के लिए हम एक बार ही बता देते हैं कि चारों वेदों में इस वर्ण व्यवस्था का कोई पता नहीं है, कोई वर्णन नहीं है और कोई चर्चा तक नहीं है। वेदों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शब्दों के साथ वर्ण शब्द का कहीं संयोग नहीं है। वेदों में आर्य वर्ण और दस्यु वर्ण यह दो ही वर्ण माने गये हैं। स्वयं स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेद के 1/4/10/8 मन्त्र को प्रमाण रूप से पेश करते हुए सिद्ध किया है कि वैदिक कालीन सभ्यता में मनुष्यों के दो ही वर्ण थे-आर्य और दस्यु। मन्त्र इस प्रकार है-
विजानीहि आर्यान् ये च दस्यवः,
    बर्हिष्मते रन्धया शासत् अव्रतान्।
अर्थात्-हे मनुष्यो! तुम लोग भली प्रकार जान लो कि आर्य कौन हैं और दस्यु कौन हैं। इस मन्त्र में स्पष्ट प्रतिपादन है कि आर्य और दस्यु ये दो ही मनुष्यों के वेद प्रतिपादित भेद हैं। यहाँ कई लोग यह बहकाते हैं कि मुख्य तो दो भेद वेद में हैं ही परन्तु आर्यों के अवान्तर चार भेद हैं-जिनको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नाम से पुकारा जाता है। परन्तु इनकी बहकावट में वे ही लोग आ सकते हैं जिन्होंने वेदों की पंक्ति-पंक्ति का पर्यालोचन न किया हो। हमने लगातार 12 वर्ष तक वेदों का स्वाध्याय किया है। हम बताते हैं कि इनकी इस चाल का जवाब क्या है। वेद में जहाँ ‘आर्य और दस्यु’ दो भेद बताए हैं वहाँ अनेक स्थलों पर ‘उत शूद्रे उतआर्ये’ ऐसा भी आया है। इसका प्रयोजन यह है कि शूद्र और आर्य यह मनुष्यों के दो विभाग हैं। मनुस्मृति में भी आया है- अनार्यायां समुत्पन्नो ब्राह्मणातु यद्दच्छया। इत्यादि तथा स्वामी दयानन्द जी ने भी सत्यार्थ प्रकाश के 10वें समुल्लास में स्वीकार कर लिया है कि शूद्र आर्य नहीं हैं। प्रमाणार्थ उनका यह लेख पर्याप्त है-
आर्याधिष्ठिताः शूद्राः संस्कर्त्तारःस्युः अर्थात् आर्य लोगों के यहाँ शूद्र रसोई बनावें। बस सिद्ध हो गया कि आर्यों में शूद्रों की गणना नहीं है। कितना अन्धेर है। अब विचारणीय यह है कि जब आर्यों के अन्दर शूद्रों का समावेश हो ही चुका है तो फिर ये शूद्र शब्द पृथक क्यों है। इससे यही सिद्ध होता है कि आर्यों में शूद्र नहीं हैं। देखो मनुस्मृति में जातोऽपि अनार्यात् आर्यायां अनार्यइति निश्चयः।10/6। इस प्रकार आर्य और दस्यु यह दो वर्ण ही मनुष्यों के वेद में प्रतिपादित हैं। वेद में आया भी है आर्य वर्ण मावत् और उभौवर्णों इत्यादि जिसका स्पष्ट प्रयोजन यह है कि दो ही वर्ण मनुष्यों के होते हैं। अब इस वर्ण शब्द की छानबीन कीजिए। वर्ण का मुख्य अर्थ है रंग (Colour)। इस आधार पर भी मनुष्य के दो रंग (वर्ण) स्वयं सिद्ध हैं। काला (Black) और गोरा (White) यही दो रंग मनुष्यों में पाये जाते हैं। इस प्रकार भी चातुर्वर्ण्य की सिद्धि वेदों से नहीं होती है। यह चातुर्वर्ण्य का ढकोसला मनुस्मृति की मनमानी है।
वेदों में वर्ण व्यवस्था के प्रतिपादक तीन मन्त्र मुख्य रूप से प्रस्तुत किये जाते हैं। पहला मन्त्र इस प्रकार है-
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
    उरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत्॥
- यजु. 31/11
यह मन्त्र सामवेद को छोड़ कर शेष तीनों वेदों में कुछ परिवर्तनपूर्वक पाया जाता है। सर्वप्रथम ऋग्वेद के दशम मण्डल में यह मन्त्र मिलता है। यहाँ यह बता देना भी अप्रासंगिक न होगा कि ऋग्वेद के दशम मण्डल को पुरातत्वविशारद (Historians) बहुत पीछे का बना हुआ बताते हैं। अष्टाध्यायी के भाष्यकर्त्ता, प्रकाण्ड पण्डित मेजर बी.डी. वसु (प्रयाग) ने यह सिद्ध करके दिखा दिया है कि इस मण्डल की रचना अर्वाचीन है। जितने भी पाश्चात्य स्कॉलर हुए हैं सभी ने ऋग्वेद के 9 मण्डलों को ही सर्व प्राचीन (The oldest book) माना है। फिर एक बात विचारणीय यह भी है कि जब वेद ईश्वरीय वाणी है तो यजुर्वेद और अथर्ववेद में यह मन्त्र कुछ परिवर्तन के साथ क्यों पाया जाता है। क्या यह परिवर्तन ऋषि (ब्राह्मण) कृत है या प्रभु (ब्रह्म) कृत? जब अर्थ में कोई भेद नहीं तो ईश्वरीय वाणी में इस प्रकार का घोटाला करने से क्या मतलब? मालूम ऐसा होता है कि जब मुगलकाल में वेद आदि ग्रन्थ जलाए गए और उस समय के पूज्य ब्राह्मणों ने वेद कंठस्थ कर लिए तब इन वेदों के अनेक पाठभेद हो गये जो बिल्कुल स्वाभाविक है। ऐसी दशा में वेदों के बिल्कुल विशुद्ध मौलिक स्वरूप का पता पाना दुरूह है। इसलिए वर्ण व्यवस्था के परमपोषक इस मन्त्र का भी शुद्ध रूप लुप्तप्राय है। यह जो स्वरूप मिलता है वह ब्राह्मणों की स्मृति का शेष है। इस मन्त्र में ब्राह्मण आदि चार शब्दों का समावेश तो अवश्य है-परन्तु ये वर्ण हैं या समाज शरीर के अवयव, यह बात बुद्धि से सोचने की वस्तु है। यदि इस मन्त्र का ही वास्तविक रूप समझ लिया जाय तो वर्ण व्यवस्था की समस्या हल हो जाय। देखिए-सारे शरीर के चार विभाग किये गये-सिर, हाथ, पैर और पेट। इसी प्रकार सारे मनुष्य समुदाय के चार विभाग किये गये-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। जिस प्रकार सिर से हाथ नीच नहीं और पैर से पेट नीच नहीं इसी प्रकार ब्राह्मण से क्षत्रिय नीच नहीं और शूद्र से वैश्य नीच नहीं। ये तो मनुष्य समाज रूपी शरीर के चार अवयव (हिस्से) हो गये। इसी को दूसरे शब्दों में यों कहा जा सकता है कि मनुष्यों के मुख्य चार विभाग हैं जो कर्म-विभाग (Division of labour) के सिद्धान्त के आधार पर हैं। कर्म विभाग या श्रम विभाग में कोई नीच-ऊँच का प्रश्न नहीं है। सभी की उपादेयता (Utility) समान रूप से अनिवार्य है। इसके लिए वर्ण व्यवस्था का प्रतिपादक दूसरा मन्त्र जो प्रस्तुत किया जाता है, वह यह है-
ब्रह्मणे ब्राह्मणं, क्षत्रायराजन्यं, मरुद्भ्यो वैश्यं, तपसे शूद्रम्
    तमसे तस्कर, नारकाय वीरहणं, पाप्मने क्लीबं, आक्रयाय
    अयोगूं, कामाग पुंश्चलूं, अतिक्रुष्टाय मागधम्॥
- यजु. 30।5॥
इस मन्त्र का वास्तविक अभिप्राय समझने के लिए इससे पहला मन्त्र विशेष रूप से मननीय है। मन्त्र इस प्रकार है-
विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः।
    सवितारं नृचक्षसम्॥
- यजु. 30/4
इस मन्त्र में परमेश्वर से प्रार्थना की गयी है कि हम ऐसे राजा को चाहते हैं जो हमारे कर्मों (Duties) को यथा नियम विभक्त कर दे। और फिर राज्य में होने वाले सभी आवश्यक पेशों की चर्चा इस अध्याय में की गयी है। उसी सिलसिले में ब्राह्मणे ब्राह्मणं आदि बताया है। अर्थात् वेद ज्ञान के प्रचार के लिए ब्राह्मण का कर्म, राज्य रक्षा के लिए क्षत्रिय का कार्य, प्रजाओं के साधारण व्यवहार के लिए वैश्य का कार्य और विशेषकर कष्ट साध्य तापस कार्यों के लिए शूद्र का कर्म है। अभी यह मन्त्र अधूरा हुआ। आगे भी इसी प्रकार पेशों का वर्णन है, जिनमें तस्कर, क्लीब और पुश्चलू भी हैं-परन्तु सर्व तो मुख्य चार कर्म विभक्त करके इन्हीं के अन्तर्गत सबका समावेश है। वे वर्ण नहीं हैं; नहीं तो (नपुंसक) क्लीब भी वर्ण हो जाएगा। इसी को कर्म-विभाग या श्रम विभाग (Division of labour) का सिद्धान्त कहते हैं। आज कल योरप में भी माना जाता है कि-
Four Ms make the monarchy as
    Missionary, Military, Merchants & Menials.
इन सबका आधारभूत सिद्धान्त श्रम विभाग या कर्म-विभाग है। इतना और स्मरण रखना चाहिए कि उक्त मन्त्र द्वारा वेद की यह भी साथ-साथ आज्ञा है कि राजा को ही यह अधिकार है कि इस कर्मविभाग को न्यायपूर्वक प्रचलित करे। स्वामी दयानन्द ने भी वर्तमान वर्ण व्यवस्था को मरण व्यवस्था सिद्ध करते हुए यह लिखा है कि गुण कर्म स्वभावानुकूल यह कर्म विभाग (वर्ग-व्यवस्था) राजा ही व्यवस्थित रूप से कर सकता है। ऐसी दशा में आर्यसमाज का वर्ण व्यवस्था के लिए ढोल पीटना निरा ढोंग और दम्भ नहीं तो क्या है। वास्तविक दशा तो यह है कि हिन्दुओं का यह घातक रोग आर्यसमाजियों की नस नस में घुसा हुआ है, क्योंकि आर्यसमाजी हैं तो बने हिन्दुओं में से ही-तो फिर सहसा कैसे उन्हें इस राजरोग से मुक्ति प्राप्त हो सकती है? अस्तु! यहाँ तक हमने संक्षेप से यह प्रतिपादन करने का प्रयत्न किया है कि वर्ण-व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप-जो वेदोक्त है-वह कर्म-विभाग है और इसका नियन्त्रण (Control) राजा ही कर सकता है। इसलिए एक गुलाम देश का निवासी वर्ण-व्यवस्था का ढोंग रचकर अपने पैरों पर कुठाराघात ही कर सकता है, और कुछ नहीं। फलतः हमारा देश रसातल को चला जा रहा है और हिन्दू लोग वर्ण-व्यवस्था की बेहूदी बिलबिलाहट मचाए हुए हैं। इसीलिए न दलितोद्धार होता है और न देशोद्धार। हो भी कैसे जब हिन्दू लोग जन्म से ही अपना पैतृक अधिकार जमाए हुए दलितों को दाल की तरह दलने के लिए दनदना रहे हैं। अब हम तीसरा मन्त्र प्रस्तुत करते हैं जो वर्ण व्यवस्था के पोषक प्रायः पेश किया करते हैं। मन्त्र इस प्रकार है-
प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु नस्कृधि।
    प्रियं विश्येषु शूद्रेष मय धेहि रुचारुचम्॥
इस मन्त्र में राजा परमेश्वर से प्रार्थना कर रहा है कि मेरे शूद्र आदि सभी जनों का मंगल सदा होवे। और मेरी शोभा इसी से होवे। इसमें राजा ने अपने को सब से अलग कर लिया और अपने अधीन देव आदि जनों का कल्याण और मंगल चाहा है। इससे स्पष्ट यह सिद्ध होता है कि राजा ही इन कार्य-विभाग को व्यवस्थित कर सकता है। फिर एक ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इस मन्त्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि शब्द नहीं हैं। इससे यह पता लगता है कि ब्राह्मण आदि शब्दों पर ही कोई बात नहीं है। विद्यासमिति, राजसमिति, अर्थसमिति और सेवासमिति ही राज्य कार्य के चार मुख्य कर्म विभाग हैं। जिनमें विद्यासमिति का अध्यक्ष तो राजा नहीं होता था। कोई देव, विद्वान, वेदज्ञ ही विद्यासमिति का सभापति होता है। शेष तीन समितियों का अध्यक्ष राजा स्वयं होता था। तभी वेद में आया है-
त्रीणि राजाना विदथे पुरुणि परि
    विश्वानि भूषथः सदांसि।
देखिए-वर्ण-व्यवस्था शब्द का अर्थ ही यह है कि कोई वर्णों की व्यवस्था करता है। जैसे पण्डितों से व्यवस्था लेना। इसी प्रकार राजा से व्यवस्था लेकर काम चलता है। तभी रघुवंश 5/17 में रघुराजा को वर्णाश्रम का गुरु बताया है। देखिए-
वर्णाश्रमाणां गुरवे स वर्णी, विचक्षणः प्रस्तुतमाचचक्षे॥
इस प्रकार वेदों में वर्तमान वर्ण-व्यवस्था का कोई स्थान नहीं सिद्ध हो पाया। अब विचारणीय यह है कि फिर स्वामी दयानन्द जैसे वेदों के प्रकाण्ड पण्डित ने वर्ण व्यवस्था को क्यों स्वीकार कर लिया। बात यह है कि स्वामी दयानन्द ने वर्तमान वर्ण-व्यवस्था का तो जोरदार खण्डन किया है और वैदिक (कर्म-विभाग) वर्ण व्यवस्था का ही प्रतिपादन किया है-जिसकी चर्चा हमने पूर्व के पृष्ठों में संक्षेप से की है-परन्तु उन्होंने प्राचीनता के प्रवाह में बहकर ‘वर्ण व्यवस्था’ शब्द का खण्डन नहीं किया-यही उनकी एक भ्रमोत्पादक स्थिति हो गयी है। देखिए-स्वामीजी ने सत्यार्थप्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में इस बात की पुष्टि में कि एक शूद्र कुलोत्पन्न मनुष्य भी ब्राह्मण हो सकता है-दो ही प्रमाण प्रस्तुत किये हैं; एक तो मनुस्मृति का ‘शूद्रो ब्राह्मणतामेति’ इत्यादि श्लोक तथा दूसरा आपस्तम्ब सूत्र का निम्न प्रमाण-
धर्म चर्यया जघन्यो वर्णः
पूर्व पूर्व वर्ण मापद्यते-जाति परिवृत्तौ॥
अर्थात्-धर्माचरण से नीचे वर्ण भी उच्च वर्ण को प्राप्त हो जाता है। इस प्रमाण में ‘जाति परिवृत्तौ’ का अर्थ स्वामी दयानन्द ने नहीं किया। क्यों! इसका उत्तर आज तक किसी ने हमारे समक्ष स्पष्ट नहीं दिया। बात यह है कि ‘जातिपरिवृत्तौ’ का अर्थ है-दूसरे जन्म में; क्योंकि इस प्रमाण में वर्ण और जाति दोनों शब्द आए हैं। वर्ण का अर्थ तो ब्राह्मण क्षत्रिय आदि हो गया और जाति का अर्थ जन्म है ही। देखिए-
समान प्रसवात्मिका जातिः इस सूत्र के अनुसार जाति पैदायशी होती है। अब बताइए स्वामी जी के पेश किये हुए प्रमाण में क्या बल रहा? फिर मनुस्मृति का श्लोक तो बिल्कुल प्रपंच है, क्योंकि सारी मनुस्मृति जन्ममूलक वर्ण व्यवस्था की परितोषक है। मनुस्मृति का निर्माण ही जन्ममूलक वर्ण व्यवस्था के आधार पर है। देखिए-
उत्कृष्टां जातिमश्नुते, श्रुतं देशं च जातिं च, एवं
    ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामधिजायते।
इत्यादि वचनों में सर्वत्र जाति शब्द का व्यवहार है, वर्ण नहीं। प्रयोजन यह है कि वर्ण-व्यवस्था का सारा प्रपंच मनुस्मति ने खड़ा किया है। यदि वेदों की कर्म-विभाग पद्धति प्रचलित होती तो यह सब आडम्बर न होता-परन्तु जब तक स्वराज्य न होगा वैदिक कर्म विभाग (वर्ग-व्यवस्था) की स्थापना सम्भव नहीं और जब तक वर्तमान जन्म-मूलक वर्ण-व्यवस्था रहेगी तब तक स्वराज्य की स्थापना सम्भव नहीं। इस प्रकार इतरेतराश्रय दोष में फँसे हुए भारतवासी अपना अमूल्य समय वृथा गँवा रहे हैं और सुधार प्रिय आर्य समाज भी व्यर्थ ही वर्ण व्यवस्था का बवंडर खड़ा किये हैं। कल्याण इसी में है कि इस वेद विरुद्ध वर्ण व्यवस्था का विध्वंस एक स्वर से कर दिया जाय और श्रेष्ठकर्म-सम्पन्न दलितों, यवनों और म्लेच्छों के साथ मिलकर एक विशाल आर्य जाति (Aryan Nation) का निर्माण किया जाय! यही वेदाज्ञा है-
विजानीहि आर्यान, ये च दस्यवः।
    तभी हम कहा करते हैं कि-
रास्ता सीधा पड़ा है इसमें कुछ खटका नहीं।
    आज तक इस राह में रहबर कोई भटका नहीं॥
सबै भूमि गोपाल की या में अटक कहाँ।
    जाके मन में अटक है, सो ही अटक रहा॥
 
  ...परन्तु अफ़सोस तो यही हैं हैं हमें की अब अपनी सांस्कृतिक धरिहार से ज्यादा बेढंगी पाश्चात्य शैली पर विशवास हैं,

--------- अजीत प्रताप सिंह ----------